क्या भारत अपनी ही विरासत को खो रहा है? भारत की पहचान बनाने वाले लाखों कारीगर आज अपने ही देश में संघर्ष कर रहे हैं। बनारस की बनारसी साड़ियां, कच्छ की पारंपरिक कढ़ाई, मुरादाबाद का पीतल, चन्नपटना के लकड़ी के खिलौने और सदियों पुरानी हस्तकलाएं — इन सबके पीछे हैं ऐसे हाथ, जिनका हुनर पीढ़ियों से भारत की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए है। लेकिन आज सवाल है: जब उनके बनाए उत्पाद हजारों रुपये में बिकते हैं, तो उन्हें बनाने वाले कारीगरों को कितना मिलता है? क्या मशीनों से बने सस्ते उत्पाद पारंपरिक हुनर को खत्म कर रहे हैं? क्या बिचौलियों और बाजार की व्यवस्था में कारीगर को उसकी मेहनत का सही मूल्य मिल रहा है? सरकारी योजनाएं वास्तव में उन तक पहुंच रही हैं? और क्या अगली पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ाना चाहती है? इप्शिता शुक्ला के साथ attlas की यह विशेष खोजी डॉक्यूमेंट्री भारत के पारंपरिक कारीगरों, उनकी आर्थिक वास्तविकता, सरकारी पहलों और उस बाजार की पड़ताल करती है जो उनके हुनर से मुनाफा कमाता है। यह सिर्फ हस्तशिल्प की कहानी नहीं है। यह उन हाथों की कहानी है, जिन्होंने भारत बनाया — लेकिन आज जिन्हें खुद अपने भविष्य की चिंता है। प्रस्तुतकर्ता: इप्शिता शुक्ला निर्माण: attlas #MadeInIndia #IndianArtisans #IndianHandicrafts #VocalForLocal #Handloom #IndianHeritage #IpshitaShukla #attlas
